रतलाम / सैलाना सकरावदा (सेमलखेड़ा)। परंपरागत खेती को बढ़ावा देने, देशी बीजों की विरासत को सहेजने और किसानों के बीच बीजों के आदान-प्रदान की परंपरा को मजबूत करने के उद्देश्य से वाग्धारा संस्था के तत्वावधान में सैलाना ब्लॉक के सेमलखेड़ा गांव में रबी बीज उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ग्रामीणों और किसानों को देशी बीजों के महत्व की जानकारी देते हुए इनके संरक्षण, संवर्धन और आने वाली पीढ़ियों तक पारंपरिक कृषि ज्ञान पहुंचाने का संदेश दिया गया।
उत्सव के दौरान चना, सरसों, मसूर सहित अन्य रबी फसलों के परंपरागत देशी बीजों पर चर्चा की गई। ग्रामीणों को बताया गया कि देशी बीज केवल फसल उत्पादन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे हमारी कृषि संस्कृति, खानपान, परंपराओं और किसानों की आत्मनिर्भरता से भी जुड़े हैं। पहले किसान अपनी फसल से अच्छे बीज चुनकर अगली बुवाई के लिए सुरक्षित रखते थे और जरूरत पड़ने पर दूसरे किसानों एवं परिवारों के साथ उनका आदान-प्रदान करते थे। इस परंपरा को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता जताई गई।
बीज हमारी विरासत, संरक्षण की जिम्मेदारी भी हमारी
कार्यक्रम में माही मध्य प्रदेश के यूनिट लीड धर्मेंद्र सिंह चुंडावत ने कहा कि बीज केवल खेती करने का साधन नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, आत्मनिर्भरता और आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं। किसानों को अपने क्षेत्र में उपलब्ध स्थानीय देशी बीजों की पहचान कर उन्हें संरक्षित करना चाहिए। साथ ही, इन बीजों को अधिक से अधिक परिवारों तक पहुंचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने चाहिए, ताकि गांवों में बीजों की उपलब्धता बनी रहे और किसानों की बाहरी बाजार पर निर्भरता कम हो सके।
ब्लॉक सहजकर्ता पिंकी टेलर ने बीज स्वराज की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अपने बीजों को पहचानना, स्वयं तैयार करना, सुरक्षित रखना और जरूरत के समय दूसरे परिवारों के साथ साझा करना ही बीज स्वराज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने महिलाओं और युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि घरों में सुरक्षित रखे जाने वाले बीजों से जुड़ी पारंपरिक जानकारी को सहेजना और बच्चों तक पहुंचाना जरूरी है। इससे नई पीढ़ी भी अपनी खेती और पारंपरिक कृषि पद्धतियों से जुड़ी रहेगी।
पारंपरिक तरीकों से बीज संरक्षण की दी जानकारी
कार्यक्रम में बीजों को सुरक्षित रखने के पारंपरिक तरीकों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। ग्रामीणों को मिट्टी के कोठों, नीम की पत्तियों और राख के उपयोग जैसी परंपरागत विधियों की जानकारी दी गई। इसके साथ ही गांव में उन परिवारों की पहचान करने पर जोर दिया गया, जिनके पास अच्छी गुणवत्ता वाले परंपरागत बीज उपलब्ध हैं। ऐसे परिवारों के माध्यम से अन्य किसानों तक बीज पहुंचाने और खेती से जुड़े अनुभव साझा करने के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया गया।
हर परिवार 10 प्रकार के देशी बीज बचाए
बीज उत्सव के माध्यम से समुदाय के सामने एक महत्वपूर्ण संदेश रखा गया कि प्रत्येक परिवार कम से कम 10 प्रकार के देशी बीजों को संरक्षित करने का प्रयास करे और उन्हें कम से कम पांच अन्य परिवारों के साथ साझा करे। इस पहल का उद्देश्य गांव में बीजों की विविधता बनाए रखना, पारंपरिक बीजों की उपलब्धता बढ़ाना और किसानों के बीच परस्पर सहयोग की भावना को मजबूत करना है।
कार्यक्रम में सामुदायिक सहजकर्ता अमृत राम परिहार, कांतिलाल, मनोज डामर, जगदीश गामड़, पीरचंद्र भाभर और फतेसिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत