रतलाम। नगर निगम द्वारा गरीब फ्लैटधारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर शहर की राजनीति गरमा गई है। शहर कांग्रेस ने नगर निगम पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि निगम ने वर्षों पहले गरीब झुग्गीवासियों को पक्का मकान देने का सपना दिखाया, उनसे उनकी पुश्तैनी झुग्गियां खाली करवाईं, लेकिन बाद में अपने ही वादे से मुकरकर सैकड़ों परिवारों को अतिक्रमणकारी घोषित कर बेघर कर दिया।
कांग्रेस ने इस पूरे मामले को गरीबों के साथ धोखाधड़ी, अमानवीय व्यवहार और कानून का खुला उल्लंघन बताते हुए उच्च स्तरीय जांच तथा जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग की है।
कांग्रेस के अनुसार वर्ष 2020-21 में नगर निगम ने शिवनगर, प्रकाशनगर और जावरा रोड क्षेत्र की 50 से 60 वर्ष पुरानी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीब परिवारों को यह भरोसा दिलाया था कि मात्र 20 हजार रुपये मार्जिन मनी जमा करने पर उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत फ्लैट उपलब्ध कराए जाएंगे तथा शेष 1.80 लाख रुपये का बैंक ऋण दिलाने की पूरी जिम्मेदारी नगर निगम की होगी। इसी विश्वास पर सैकड़ों परिवारों ने अपनी झुग्गियां खाली कर दीं और नगर निगम को सौंप दीं।
कांग्रेस का आरोप है कि कुल 396 हितग्राहियों में से केवल 166 लोगों को ही बैंक ऋण उपलब्ध कराया गया, जबकि 208 परिवारों को ऋण नहीं दिलाया गया। इसके बावजूद इन सभी परिवारों से 20 हजार रुपये की मार्जिन मनी जमा करवाई गई, फ्लैटों का विधिवत आवंटन किया गया और कब्जा भी सौंप दिया गया। ये परिवार पिछले चार से पांच वर्षों से उन्हीं फ्लैटों में रह रहे थे।
शहर कांग्रेस ने कहा कि अब नगर निगम यह तर्क दे रहा है कि कई हितग्राहियों का CIBIL स्कोर खराब होने के कारण ऋण स्वीकृत नहीं हो सका। कांग्रेस का कहना है कि यदि ऐसा था तो पात्रता की जांच पहले की जानी चाहिए थी। गरीब परिवारों को झुग्गियां तुड़वाने के बाद बीच रास्ते में छोड़ देना प्रशासनिक विफलता और वादाखिलाफी है। यदि बैंक ऋण नहीं मिला तो नगर निगम को वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी, न कि उन्हीं लोगों को डिफॉल्टर या अतिक्रमणकारी घोषित कर उनके घरों से बेदखल करना चाहिए था।
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि नगर निगम ने बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए 208 परिवारों का सामान घरों से बाहर फेंक दिया, फ्लैटों पर ताले लगाकर सील कर दिया और परिवारों को बेघर कर दिया। यह कार्रवाई नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 173, 174 और 175 का उल्लंघन है। इन धाराओं के तहत बकाया वसूली और कब्जा लेने की स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है, जिसमें अंतिम मांग नोटिस, 30 दिन का अवसर, आवंटन निरस्तीकरण और वारंट जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। कांग्रेस का आरोप है कि इनमें से किसी भी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
शहर कांग्रेस ने यह भी सवाल उठाया कि जिन परिवारों की 20 हजार रुपये की मार्जिन मनी आज भी बैंक और नगर निगम के पास जमा है, उनका आवंटन किस आधार पर निरस्त माना जा सकता है। यदि नगर निगम ने आवंटन समाप्त कर दिया था तो जमा राशि वापस क्यों नहीं की गई। कांग्रेस का कहना है कि जब तक राशि वापस नहीं की जाती, तब तक आवंटन समाप्त मानना कानूनी रूप से भी सवालों के घेरे में है।
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी दावा किया गया है कि 4 अगस्त को प्रभावित फ्लैटधारी आयुक्त को लिखित आवेदन देने पहुंचे थे, जिसमें उन्होंने बैंक ऋण दिलाने और बकाया राशि जमा करने की इच्छा जताई थी, लेकिन आयुक्त ने आवेदन लेने से इनकार कर दिया। बाद में वही आवेदन पंजीकृत डाक से भेजा गया।
कांग्रेस ने नगर निगम के अंतिम नोटिस में फ्लैटधारियों को बिना अनुमति अवैध कब्जा करने वाला अतिक्रमणकारी बताए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। कांग्रेस का कहना है कि जब नगर निगम ने स्वयं विधिवत आवंटन पत्र जारी किए, कब्जा दिया और वर्षों तक परिवार वहीं रहे, तो उन्हें अचानक अतिक्रमणकारी बताना प्रशासनिक षड्यंत्र और गंभीर कानूनी विरोधाभास है।
शहर कांग्रेस ने पूरे मामले की न्यायिक अथवा उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच कराने, प्रभावित 208 परिवारों को तत्काल पुनः उनके फ्लैटों का कब्जा दिलाने, बैंक ऋण की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करने तथा कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज कर कठोर कार्रवाई करने की मांग की है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर रतलाम में राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है और अब सभी की नजर नगर निगम प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी हुई है।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत