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मुल्तान, 2004। पाकिस्तान की तपती गर्मी, तापमान करीब 42 डिग्री और मैदान पर एक ऐसा पल, जिसे भारतीय क्रिकेट प्रेमी शायद ही कभी भूल पाएंगे। सामने थे पाकिस्तान के धुरंधर स्पिनर सकलैन मुश्ताक और क्रीज पर तूफानी अंदाज में बल्लेबाजी कर रहे थे वीरेंद्र सहवाग। भारत के स्कोर पर दबाव था और सहवाग इतिहास रचने से महज कुछ रन दूर थे। नॉन-स्ट्राइकर छोर पर सचिन तेंदुलकर मौजूद थे। ड्रेसिंग रूम में राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और पूरी भारतीय टीम की निगाहें वीरू पर टिकी थीं। फिर आया वह ऐतिहासिक पल। सकलैन मुश्ताक ने गेंद थोड़ी ऊपर डाली। वीरेंद्र सहवाग ने मौका भांपा, क्रीज से आगे निकले और पूरे आत्मविश्वास के साथ बल्ला घुमा दिया। गेंद हवा में ऊंची उठी और लॉन्ग ऑन के ऊपर से सीधे स्टैंड में जा गिरी। छक्का! वीरू ने अपना हेलमेट उतारा, बल्ला उठाया और चेहरे पर मुस्कान के साथ इतिहास को सलाम किया। इस छक्के के साथ उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में अपना पहला तिहरा शतक पूरा किया। सहवाग की पारी आखिरकार 309 रन पर समाप्त हुई। वह सिर्फ एक छक्का नहीं था। वह भारतीय क्रिकेट के उस बेखौफ अंदाज की तस्वीर थी, जिसने दुनिया को बताया कि भारतीय बल्लेबाज अब सिर्फ बचाव नहीं करते, बल्कि मौका मिलते ही गेंद को स्टैंड में पहुंचाना भी जानते हैं। वीरू पाजी आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर हैं, लेकिन मुल्तान का वह छक्का आज भी करोड़ों भारतीयों के दिल में उसी शान से गूंजता है। आपने वीरू का वह ऐतिहासिक 300 वाला छक्का टीवी पर देखा था या रेडियो पर सुना था? रिपोर्ट : कन्हैयालाल जी सोलंकी |