उज्जैन । भारतीय संस्कृति ज्योतिष साहित्य पत्रकारिता पुरातत्त्व और स्वतंत्रता आंदोलन के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान देने वाले प्रख्यात विद्वान पद्मभूषण पं. सूर्यनारायण व्यास का सोमवार, 22 जून को 50वां पुण्य स्मरण दिवस मनाया जा रहा है। भारतीय अस्मिता के इस तेजस्वी प्रतीक को देशभर में श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है।
2 मार्च 1902 को उज्जैन के सिंहपुरी क्षेत्र में जन्मे पं. सूर्यनारायण व्यास का 22 जून 1976 को निधन हुआ था। अपने 74 वर्ष के जीवनकाल में उन्होंने भारतीय संस्कृति और राष्ट्रचेतना को नई दिशा प्रदान की। उनकी बहुआयामी प्रतिभा ने उन्हें केवल एक ज्योतिषाचार्य ही नहीं बल्कि क्रांतिकारी साहित्यकार पत्रकार इतिहासकार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत के रूप में स्थापित किया।
विद्वान परिवार में जन्म, बचपन से मिला संस्कारों का वातावरण
पं. व्यास के पिता पं. नारायणजी व्यास संस्कृत, ज्योतिष और व्याकरण के प्रकांड विद्वान थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और महामना मदनमोहन मालवीय जैसे राष्ट्रीय नेता भी उनसे मिलने उज्जैन आया करते थे। ऐसे विद्वतापूर्ण वातावरण में पले-बढ़े सूर्यनारायण व्यास के व्यक्तित्व में बचपन से ही राष्ट्रप्रेम और भारतीय ज्ञान परंपरा के संस्कार विकसित हुए।
संस्कृत, हिंदी, गुजराती, मराठी और बंगला सहित अनेक भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। किशोरावस्था में ही उनकी रचनाएं प्रकाशित होने लगी थीं। उन्होंने प्रारंभिक दौर में शम्स उज्जयिनी नाम से उर्दू शायरी भी की।
स्वतंत्रता संग्राम में निभाई सक्रिय भूमिका
वर्ष 1921 से पं. व्यास स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। सिद्धनाथ माधव आगरकर के संपर्क में आने के बाद उन्होंने लोकमान्य तिलक की जीवनी का अनुवाद किया। वीर सावरकर की पुस्तक अंडमान की गूंज से वे अत्यंत प्रभावित थे।
1930 के अजमेर सत्याग्रह में उन्होंने उज्जैन के जत्थे का नेतृत्व किया और ब्रिटिश सत्ता के प्रतीक लॉर्ड मेयो की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने जैसी साहसिक गतिविधियों में भी भाग लिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने गुप्त रेडियो स्टेशन संचालित किया और उनके गुरुकुल में कई क्रांतिकारियों को शरण मिली।
भारत की स्वतंत्रता का समय पहले ही कर दिया था घोषित
पं. सूर्यनारायण व्यास ने वर्ष 1930 में ही भविष्यवाणी की थी कि भारत अगस्त 1947 में स्वतंत्र होगा। स्वतंत्रता के पूर्व अंतिम दौर में तत्कालीन संविधान सभा अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गोस्वामी गणेश दत्त महाराज के माध्यम से उन्हें दिल्ली बुलाया।
बताया जाता है कि अंग्रेजों द्वारा सुझाई गई 14 और 15 अगस्त की तिथियों में से पं. व्यास ने पंचांग के आधार पर 15 अगस्त को अधिक शुभ माना तथा मध्यरात्रि में ध्वजारोहण का सुझाव दिया, जिसे स्वीकार किया गया। इसी कारण देश की स्वतंत्रता की घोषणा और तिरंगा फहराने का ऐतिहासिक क्षण मध्यरात्रि में संपन्न हुआ।
पत्रकारिता और साहित्य में अमिट योगदान
पं. व्यास ने प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका विक्रम का संपादन किया और व्यास उवाच तथा बिंदु-बिंदु शीर्षकों से 2500 से अधिक संपादकीय लिखे। उनका व्यंग्य संग्रह तू-तू : मैं-मैं हिंदी व्यंग्य साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है।
यात्रा-वृत्तांत सागर प्रवास संस्मरण निबंध इतिहास और पुरातत्त्व विषयों पर उनकी अनेक रचनाएं आज भी शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ मानी जाती हैं।
उज्जैन के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के शिल्पकार
उज्जैन के गौरवशाली इतिहास, कालिदास, विक्रमादित्य और महाकाल की परंपरा को पुनर्जीवित करने में पं. व्यास की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके प्रयासों से कालिदास जयंती आयोजन की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर अखिल भारतीय कालिदास समारोह के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
विक्रम विश्वविद्यालय, विक्रम कीर्ति मंदिर, सिंधिया शोध प्रतिष्ठान और कालिदास परिषद जैसी संस्थाओं की स्थापना के पीछे भी उनकी प्रेरणा और दूरदृष्टि का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उनके गुरुकुल में हजारों विद्यार्थियों ने शिक्षा प्राप्त की जहां शिक्षा भोजन और आवास की व्यवस्था निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती थी।
पद्मभूषण लौटाकर दिया सिद्धांतों का संदेश
भारत सरकार ने वर्ष 1958 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया था। हालांकि वर्ष 1967 में अंग्रेजी भाषा को स्थायी रूप से बनाए रखने संबंधी नीति के विरोध में उन्होंने यह सम्मान लौटा दिया। उनके लिए सिद्धांत और राष्ट्रभाषा का सम्मान किसी भी पुरस्कार से अधिक महत्वपूर्ण था।
वर्ष 2002 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
आज भी जीवंत है उनकी विरासत
उनके पुत्र एवं दूरदर्शन के पूर्व अधिकारी तथा लेखक राजशेखर व्यास ने उनकी वैचारिक और साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाया। उज्जैन स्थित कालिदास अकादमी, सूर्यनारायण व्यास संकुल सहित अनेक संस्थाएं आज भी उनके योगदान की स्मृति को संजोए हुए हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रचेतना के संवाहक पं. सूर्यनारायण व्यास का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
उनके 50वें पुण्य स्मरण दिवस पर देशभर से विद्वानों साहित्यकारों और संस्कृति प्रेमियों द्वारा उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है।
— देशना जैन
स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत