रतलाम / सैलाना
रतलाम जिले के सैलाना तहसील में एक चौंकाने वाले भूमि घोटाले ने फिर से सुर्खियां बटोर ली हैं। लगभग 50 साल पुरानी शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे और कॉलोनी विकसित करने का मामला अब राजनीतिक हलकों में गरमाया हुआ है। 1950-60 के दशक में चरागाह और पंचायत भवन के रूप में दर्ज दो मूल्यवान जमीनों—सर्वे नंबर 860 (0.330 हेक्टेयर) और 863/2 (0.530 हेक्टेयर)—को बिना किसी वैध प्रक्रिया के निजी स्वामित्व में परिवर्तित कर प्लॉट काटे गए।
इस घोटाले से लाखों-करोड़ों रुपये का राजस्व नुकसान हुआ है और अब नगर परिषद सैलाना की भूमिका भी जांच के घेरे में आ गई है।
हाल ही में 2 दिसंबर 2025 को कलेक्टर रतलाम की जनसुनवाई में प्रस्तुत आवेदन (पंजीयन क्रमांक 48336) के बाद यह मामला फिर से सक्रिय हो गया है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि इन जमीनों को शासकीय घोषित किया जाए और नामांतरण रद्द कर कब्जे हटाए जाएं। जनसुनवाई की अवधि समाप्त हो चुकी है, लेकिन कलेक्टर कार्यालय में प्रकरण लंबित है।
शिकायत की जड़: 2021 में खुला राजपरिवार से जुड़ा काला अध्याय
यह मामला 2021 से जुड़ा है, जब स्थानीय निवासी (नाम गोपनीय) ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सैलाना को शिकायत दर्ज कराई।
शिकायतकर्ता ने बताया कि सैलाना ग्राम की ये दोनों जमीनें वर्ष 1957-58 के खसरा रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से शासकीय चरागाह (चरनोई) और पंचायत भवन के रूप में दर्ज हैं। लेकिन हाल के वर्षों में इन्हें कृषि से गैर-कृषि (आवासीय प्लॉटिंग) में बदलकर निजीकरण कर दिया गया जो मध्य प्रदेश भूमि राजस्व संहिता 1959 का घोर उल्लंघन है।
शिकायतकर्ता ने प्रमाणित पुराने रिकॉर्ड संलग्न किए जिसमें सर्वे नंबर 860 को पूरी तरह शासकीय मद में दिखाया गया। उन्होंने मांग की कि राजस्व रिकॉर्ड की जांच हो और अवैध परिवर्तन साबित होने पर जमीनें शासकीय बहाल की जाएं।
यह शिकायत क्रमांक 022/ब-121/2021-22 के तहत दर्ज हुई, जो जल्द ही एक बड़े घोटाले का रूप लेने लगी।
जांच का खुलासा: बिना आदेश के 1969 में राजपरिवार के नाम पर नामांतरण
अनुविभागीय अधिकारी ने शिकायत मिलते ही जांच शुरू की।
सबसे पहले, दोनों सर्वे नंबरों पर सार्वजनिक विज्ञप्ति जारी की गई जिसमें दावा-आपत्ति के लिए 30 दिन का समय दिया गया।
आश्चर्यजनक रूप से, इस दौरान कोई पक्षकार सामने नहीं आया। फिर, हितधारक पक्षकारों—भूरामल तांतेड़, प्रितेश चंडालिया (पिता: सुभाषचंद्र), दिलीप सोनी (पिता: रमेशचंद्र) और दिग्विजयसिंह राठौर—को नोटिस भेजे गए।
इन पक्षकारों के बयानों से एक सिलसिला सामने आया:
दिग्विजयसिंह राठौर: उन्होंने सर्वे नंबर 860/1/1/1/2 (0.01 हेक्टेयर) को 28 दिसंबर 2020 को प्रितेश चंडालिया से रजिस्ट्री (क्रमांक MP319552020A1888594) खरीदा।
प्रितेश ने इसे 2011 में भूरामल तांतेड़ से (रजिस्ट्री 1अ/392) खरीदा था और भूरामल ने 2007 में विक्रमसिंह से (रजिस्ट्री 1अ/233)।
उन्होंने दावा किया कि जमीन 50 साल से निजी है और उनके नाम पर ऋण पुस्तिका (N258322) भी जारी हुई।
दिलीप सोनी: 860/1 (0.01 हेक्टेयर) को 2011 में भूरमल से (रजिस्ट्री 1अ/457) खरीदा।
प्रितेश चंडालिया: 860/1 (0.02 हेक्टेयर) को 2011 में भूरमल से खरीदा, फिर 0.01 हेक्टेयर को दिग्विजयसिंह को 2020 में बेचा।
नामांतरण और भू-अधिकार पत्र उनके नाम पर हैं।
भूरामल तांतेड़: सभी रजिस्ट्री का केंद्र बिंदु। उन्होंने 2008 में विक्रमसिंह (पूर्व सैलाना राजपरिवार) से खरीदा।
विक्रमसिंह ने बताया कि प्रथम अंतरण 1969-70 में उनके दादा दिग्विजयसिंह (पूर्व नरेश सैलाना) के नाम हुआ, जो वसीयत से पिता जयसिंह को मिली।
लेकिन कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सके।
तहसीलदार सैलाना की रिपोर्ट (8 जनवरी 2022) ने सबसे बड़ा खुलासा किया:
सर्वे नंबर 860: 1957-58 से 1967-68 तक पूरी तरह शासकीय चरागाह। 1968-69 में किस्तबंदी खतौनी में दिग्विजयसिंह का नाम नहीं। लेकिन 1969-70 से अचानक उनके नाम पर दर्ज—बिना कलेक्टर या तहसीलदार के आदेश के।
1969-70 से 2008 तक राजपरिवार के नाम रही फिर भूरमल को नामांतरण (पंजी क्रमांक 36, 18 जनवरी 2008)। उसके बाद छोटे प्लॉटों में बिक्री।
सर्वे नंबर 863/2: 1957-58 में पंचायत भवन और स्कूल के नाम।
2005-08 से भूरमल के नाम, पहले जयसिंह के नाम। भूरमल ने 25 से अधिक प्लॉट काटकर बेचे अवैध कॉलोनी बनी।
बाकी भाग (863/1) अभी भी पंचायत/स्कूल के नाम।
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि सब-डिवीजन (बंटवारा) का कोई रिकॉर्ड नहीं, जो भूमि राजस्व संहिता का उल्लंघन है। शासकीय भूमि का निजीकरण केवल उच्चाधिकारियों की अनुमति से संभव है।
अनुविभागीय अधिकारी की सिफारिश: शासकीय बहाली और कब्जा हटाव
सभी दस्तावेजों—शिकायतकर्ता के साक्ष्य, पक्षकार बयान, तहसीलदार रिपोर्ट और पुराने खसरा—की समीक्षा के बाद अनुविभागीय अधिकारी ने कलेक्टर रतलाम को रिपोर्ट सौंपी।
निष्कर्ष: दोनों जमीनें 1957-68 तक शासकीय थीं। 1969 का नामांतरण संदिग्ध। भूरमल द्वारा प्लॉटिंग और बिक्री से अवैध कॉलोनी बनी, जो पर्यावरण, शहरी नियोजन और भूमि सुधार कानूनों का उल्लंघन है।
सिफारिश: सर्वे नंबर 860/1 (0.330 हेक्टेयर) और 863/2 (0.530 हेक्टेयर) को शासकीय घोषित किया जाए।
सभी अवैध नामांतरण रद्द हों, कब्जे हटाए जाएं।" यदि स्वीकार हुई, तो खरीदारों (प्रितेश, दिलीप आदि) को नुकसान, लेकिन शासन को राजस्व लाभ।
2025 का नया मोड़: नगर परिषद की संलिप्तता और जनसुनवाई
प्रकरण अब और गहरा हो गया है।शिकायतकर्ता के अनुसार, नगर परिषद सैलाना ने क्रय-विक्रय रजिस्ट्री/अभिलेख के आधार पर व्यपारीकरण (निजीकरण) कर बड़े स्तर पर विकास शुल्क जमा कराकर लाखों-करोड़ों के वारे-न्यारे किए।
नगर परिषद द्वारा नामांतरण की जांच आवश्यक है, जिससे भूमाफिया, जनप्रतिनिधि और अधिकारियों के काले कारनामे उजागर हो सकते हैं।
2 दिसंबर 2025 को कलेक्टर रतलाम की जनसुनवाई में आवेदन प्रस्तुत किया गया (पंजीयन 48336)। इसमें मांग की गई कि उक्त सर्वे नंबरों को शासकीय घोषित कर कार्रवाई हो।
जनसुनवाई की अवधि समाप्त हो चुकी है, लेकिन प्रकरण कलेक्टर कार्यालय में लंबित है।
शिकायतकर्ता ने कहा, कलेक्टर को जल्द संज्ञान लेना चाहिए।
प्रभाव: यदि सिफारिश मानी गई, तो नामांतरण रद्दीकरण, प्लॉट खरीदारों को रिफंड और कानूनी कार्रवाई संभव। लेकिन नगर परिषद की जांच से बड़ा घोटाला सामने आ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला मध्य प्रदेश में शासकीय भूमि संरक्षण के लिए मिसाल बनेगा।
स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान चल रहे हैं, और यदि कार्रवाई में देरी हुई तो राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
Reporter : Jitendra Kumawat