रतलाम / सैलाना
मध्यप्रदेश सहित पूरे देश में टीईटी (Teacher Eligibility Test) को लेकर शिक्षक समुदाय में गहरी बेचैनी और असमंजस का माहौल बन गया है। वर्षों से बच्चों को शिक्षा देने वाले हजारों शिक्षक अब खुद परीक्षा की कसौटी पर खड़े होने को मजबूर हैं। खासतौर पर 1998 से 2005 के बीच नियुक्त शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य किए जाने के बाद प्रदेश भर में चिंता, तनाव और असंतोष का वातावरण दिखाई दे रहा है।
हर वर्ष गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करने वाले शिक्षक इस बार परिवार और सुकून छोड़ किताबों में जुटे नजर आ रहे हैं। कई शिक्षक-शिक्षिकाएं 25 से 30 साल बाद फिर से पढ़ाई करने को विवश हैं। नौकरी पर संकट की तलवार लटकने से मानसिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। सैलाना और बाजना क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में शिक्षक परीक्षा की तैयारी में लगे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और शिक्षा के अधिकार अधिनियम का पालन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि 2005 से पहले भर्ती हुए शिक्षकों को भी टीईटी परीक्षा पास करनी होगी। हालांकि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में केवल पांच वर्ष शेष हैं, यानी लगभग 57 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले शिक्षकों को राहत दी गई है। बाकी सभी शिक्षकों के लिए परीक्षा अनिवार्य रहेगी।
प्रदेश सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रकार की व्यापक छूट देने से इंकार कर दिया। इसके बाद शिक्षक संगठनों में नाराजगी और चिंता और अधिक बढ़ गई है।
“25 साल बाद फिर परीक्षा देना आसान नहीं”
शिक्षक समुदाय का कहना है कि जिस समय उनकी भर्ती हुई थी, उस समय लागू नियमों के अनुसार ही नियुक्तियां हुई थीं। अब दशकों बाद दोबारा परीक्षा देना व्यावहारिक रूप से कठिन है। कई शिक्षकों का कहना है कि यदि कोई अनुभवी शिक्षक एक-दो नंबर से असफल हो जाए तो उसकी वर्षों की सेवा और अनुभव का क्या होगा।
शिक्षकों का यह भी तर्क है कि पढ़ाई और परीक्षा देने की एक उम्र होती है। अब परिवार, जिम्मेदारियों और बढ़ती उम्र के बीच फिर से प्रतियोगी परीक्षा देना मानसिक रूप से बेहद कठिन साबित हो रहा है।
हजारों शिक्षकों पर संकट
जानकारों के अनुसार प्रदेश में लगभग एक से डेढ़ लाख शिक्षक इस दायरे में आ सकते हैं। रतलाम जिले में यह संख्या 3 से 4 हजार तथा सैलाना-बाजना क्षेत्र में लगभग 1 से डेढ़ हजार बताई जा रही है। कई शिक्षक अपने बच्चों के सामने संकोच के साथ फिर से किताबें खोलने को मजबूर हैं। शिक्षकों का कहना है कि यह स्थिति उनके आत्मसम्मान को भी आहत कर रही है।
“यह शिक्षक का अपमान”
मध्यप्रदेश शिक्षक महासंघ के जिला अध्यक्ष एवं प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के जिला सचिव चरणसिंह चौधरी ने कहा कि यह देशभर के लाखों शिक्षकों की रोजी-रोटी का सवाल है। केंद्र सरकार को हस्तक्षेप कर सर्वोच्च न्यायालय से राहत दिलाने का प्रयास करना चाहिए। उनका कहना है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस परीक्षा से मुक्त किया जाना चाहिए।
वहीं राज्य कर्मचारी संघ तहसील अध्यक्ष जगदीश परिहार ने इसे “शिक्षक का अपमान” बताते हुए कहा कि दशकों का अध्यापन अनुभव ही शिक्षक की सबसे बड़ी योग्यता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जिन विद्यार्थियों ने इन्हीं शिक्षकों से पढ़कर बड़े पद हासिल किए, क्या उनकी सफलता भी सवालों के घेरे में मानी जाएगी?
जुलाई-अगस्त में हो सकती है परीक्षा
जिला शिक्षा अधिकारी अशोक लोढ़ा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप वरिष्ठ कार्यालय से जो निर्देश प्राप्त होंगे, उनका पालन किया जाएगा। जानकारी के अनुसार प्रदेश में टीईटी परीक्षा जुलाई अथवा अगस्त माह में आयोजित की जा सकती है।
टीईटी को लेकर शिक्षकों की बेचैनी अब केवल एक परीक्षा का विषय नहीं रही, बल्कि यह उनके सम्मान, भविष्य और वर्षों की सेवा पर खड़े हुए बड़े सवाल के रूप में सामने आ रही है।
( स्रोत नई दुनिया : वीरेन्द्र त्रिवेदी )
रिपोर्टर : जितेन्द्र कुमावत ✍️