चीताखेड़ा : बिना पैसे, मोबाइल, कपड़ों या किसी साधन के अचानक 120 किलोमीटर दूर पहुंच जाना—संत कन्हैयालाल जी महाराज की यह घटना पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई है। रामझर महादेव मंदिर से रहस्यमयी तरीके से लापता हुए संत करीब 12 घंटे बाद राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले स्थित तिलस्वां महादेव मंदिर में मिले, जिससे लोगों के बीच चमत्कार और अंधविश्वास को लेकर बहस तेज हो गई है।
सोमवार सुबह चीताखेड़ा और दलपतपुरा झील के बीच स्थित प्राचीन तपोस्थली रामझर महादेव मंदिर की कुटिया से संत के अचानक गायब होने की खबर फैलते ही हड़कंप मच गया। ग्रामीणों और श्रद्धालुओं में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं और खोजबीन का दौर शुरू हुआ।
करीब 12 घंटे बाद संत कन्हैयालाल जी महाराज ने स्वयं पुजारी परिवार से संपर्क कर बताया कि वे तिलस्वां महादेव मंदिर में हैं। सूचना मिलते ही मंदिर समिति, परिजन और पुलिस टीम सक्रिय हुई और मंगलवार सुबह करीब 9 बजे उन्हें सकुशल वापस रामझर महादेव लाया गया।
संत ने बताई पूरी घटना
संत कन्हैयालाल जी महाराज के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से उनके मन में तिलस्वां महादेव जाने का विचार चल रहा था, लेकिन उन्होंने किसी को इसकी जानकारी नहीं दी थी। रविवार शाम करीब 5 बजे वे कुटिया में गए और दरवाजा बंद कर लिया। इसके बाद उनके शरीर में अचानक तेज गर्मी और कंपन महसूस हुआ और वे अचेत अवस्था में बाहर निकल पड़े।
उन्हें यह भी याद नहीं कि कुटिया का दरवाजा कब खुला या बंद हुआ। वे जंगल के रास्ते चीताखेड़ा रोड पहुंचे, जहां जीरन के एक व्यक्ति की गाड़ी से चीताखेड़ा आए और फिर बस के माध्यम से नीमच व सिंगोली होते हुए रात करीब 10 बजे तिलस्वां महादेव पहुंच गए।
मंदिर पहुंचने के बाद उन्होंने रातभर भजन-कीर्तन में भाग लिया और सोमवार सुबह वैशाख मास के पहले सोमवार को स्नान व पूजा-अर्चना की। सुबह करीब 10 बजे उन्हें होश आया कि उनके लापता होने से रामझर महादेव में चिंता का माहौल होगा। मोबाइल न होने के कारण उन्होंने एक व्यक्ति से फोन लेकर शाम करीब 7 बजे पुजारी परिवार के ओमप्रकाश को सूचना दी।
संत का कहना है कि वे तिलस्वां महादेव कैसे पहुंचे, यह उन्हें स्पष्ट रूप से याद नहीं है, इसे वे महादेव और अपने गुरु की कृपा मानते हैं।
चमत्कार या मानसिक स्थिति?
घटना के बाद पूरे क्षेत्र में दो तरह की राय सामने आ रही है। एक वर्ग इसे आस्था और तपोस्थली की शक्ति से जोड़कर चमत्कार मान रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे मानसिक स्थिति या संयोग का परिणाम बता रहा है।
हालांकि, स्वयं संत ने इस घटना को चमत्कार कहने से परहेज किया है। फिलहाल यह मामला आस्था, विश्वास और तर्क के बीच एक बड़ा प्रश्न बन गया है, जिसका जवाब हर व्यक्ति अपने नजरिए से तलाश रहा है।
रिपोर्ट : दशरथ माली